संस्कृति और धर्म में होने वाले समयानुसार परिवर्तन

संस्कृति और धर्म में होने वाले समयानुसार परिवर्तन

सारे विश्व में अनेक संप्रदाय हैं और वे सभी, अपनी रीती और रिवाज के अनुसार कर्म करतें हैं। खाने पीने का ढंग -अपने ईष्ट की पूजा करने का ढंग, शादी विवाह व अन्य उत्सव मनाने का ढंग, जन्म और मृत्यु के उपरांत होने वाले संस्कार इत्यादि सभी संप्रदाय अपनी-अपनी संस्कृति और रिवाज के अनुसार करतें हैं।


  हिंदू धर्म , मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, ये सब केवल संप्रदाय हैं धर्म नहीं हैं। प्रत्येक संप्रदाय की अपनी-अपनी संस्कृति होती है और उस संस्कृति अथवा रिवाज़ की कुछ बातों को लगभग  सभी सम्प्रदायों ने अपने-अपने धर्म से जोड़ लिया हैं। और अपनी संस्कृति-रिवाज़  के अनुसार से वे सभी अपने-अपने  धर्म की व्याखा करतें हैं।
    हमारी सनातन हिन्दू संस्कृति - रिवाजों को भी आदिकाल से धर्म से जोड़ दिया गया था और धर्म का भय दिखा कर कट्टर पंथियों ने समाज के लोगों पर दबाव बनाकर, हमारे लिए धर्म की नयी परिभाषा बना डाली थी। बालविवाह, सती प्रथा,बलि प्रथा तथा स्त्रियों का कुछ मंदिरों में प्रवेश वर्जित करके अनेक कुप्रथाओं को जन्म दिया गया था। समय-समय पर हमारे देश के महा पुरुषों, राजा राम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विधासागर, विवेकानन्द आदि ने इन कुप्रथाओं को समाप्त करवाया और धर्म के नाम हो रहें अत्याचारों को बंद कराया। कुछ अन्य सम्प्रदायों के समझदार लोगों ने भी कुप्रथाओं को बंद करने का प्रयास किया लेकिन उनके संप्रदाय के कट्टरपंथियों ने, धर्म का भय दिखा कर, उनके इस अच्छे प्रयास को विफल कर दिया।
        पूर्ण विश्व का स्वामी, ईश्वर एक ही है। अलग-अलग जाती-सम्प्रदाय के लोग उसे अपनी संस्कृति के अनुसार अलग-अलग नाम से पुकारतें हैं। जब हमारा ईश्वर एक है तो हम सबका धर्म भी एक ही है। धर्म का अर्थ है ,वह कर्म जिससे सभी प्राणियों का भला हो और किसी व्यक्ति अथवा स्त्री को कोई भी कष्ट न पहुचे। जिस समाज में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता है उस समाज का पतन निश्चित है। उस देश का पतन निश्चित है।
    प्रश्न यह है कि जब सबका ईश्वर एक है और धर्म भी सबका एक ही है तो, अधिकतर सभी सम्प्रदायों में आपस में भिन्नता क्यों है और टकराव क्यों हैं। कुछ  सम्प्रदायों ने अपने धर्म की परिभाषा को ठीक प्रकार न समझ कर, कट्टरवादियों की परिभाषा को स्वीकार किया और अपने समाज में पनप रहे अत्याचार का विरोध नहीं किया। किसी भी किसी का किसी के धर्म से विरोध नहीं है, संस्कृति और रिवाजों में भिन्नता के कारण ही आपस मन मुटाव है, टकराव है। समय-समय पर आवश्यकता के अनुसार यदि कोई देश,या संप्रदाय अपने समाज के उत्थान के लिए अपने रिवाजों में परिवर्तन नहीं करता है तो वहाँ सदा अशांति बनी रहेगी।

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