पुनर्जन्म के विषय में वेद और पुराणों की प्रमाणिकता

पुनर्जन्म के विषय में वेद और पुराणों की प्रमाणिकता

विधाता और उसके विधान के बारे में कोई नियम प्रमाणित करने के लिए शास्त्रों, पुराणों और ग्रंथों का सहारा लिया जाता है। हमारे यहाँ तीन तरह के ग्रन्थ प्रचलित हैं।

  • 1- निर्गत ग्रन्थ, यह ग्रन्थ किसी के लिखे हुए नहीं होते हैं। सृष्टि के आरम्भ में स्वतः प्रकट हुए होते हैं। वेद ग्रन्थ इसका उदाहरण हैं।

  • 2- स्मृति ग्रन्थ : वेदों से प्रमाणित हमारे ऋषि मुनियों के द्धारा लिखे हुए ग्रन्थ, श्रीमद्भाग्वाद पुराण और गीता ग्रन्थ आदि इसके उदाहरण है।

  • 3– कृत ग्रन्थ : ये ग्रन्थ माया बद्ध साधारण व्यक्तियों के, द्धारा लिखे जाते है । आम व्यक्तियों के द्धारा लिखे ये ग्रन्थ कभी-कभी जन मानस को भ्रमित करतें हैं।

            हमारे भारत वर्ष में अधिकांश लोग ऐसे हैं जिनको पुनर्जन्म में विश्वास नहीं है। विश्व के कुछ अन्य सम्प्रदाय के धर्म ग्रंथों में भी पुनर्जन्म का विषय नहीं है। अधिकांश लोग ऐसी सोच रखते हैं कि वर्तमान का जन्म ही सब कुछ है, मरणों उपरान्त कोई जन्म नहीं होता है।

    कुछ लोग शास्त्रों और वेद वाणी में विश्वास न करते हुए किसी व्यक्ति के पुनर्जन्म होने में विश्वास नहीं रखते हैं, इन लोगों को यह ज्ञान नहीं है कि इस जन्म में किये गए पाप कर्मो, का फल, अगले जन्म में भी मिल सकता हे। इसलिए ऐसे लोगों के मन में दुसरे प्राणियों के प्रति दया भाव नहीं होता है।

     वर्तमान में सभी व्यक्ति, अपने पूर्व जन्मों के स्वभाव के कारण सुख-दुःख उठा रहे हैं और वे इस जन्म में भी अज्ञानता के कारण सात्विक कर्म से बहुत दूर हैं।

  मनुष्य जीवन पाकर प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम ऐसा कार्य करना चाहिए की अगले जन्म में उसको यह ज्ञान प्रधान मनुष्य का शरीर मिले।  

    हम लोग सनातन हिन्दू संस्कृति में विश्वास रखने वाले, पुनर्जन्म में भी विश्वास रखतें हैं, इसलिए शास्त्र विरुद्ध कर्म करने से डरतें हैं। वेदों से लेकर भागवद पुराण तक गीता, एवं रामचरित मानस के अलावा हमारे सभी धर्मिक ग्रंथों में, पुनर्जन्म का प्रमाण मिलता है। हमारी सनातन संस्कृति में मृत्यु उपरान्त भी, मरने वालों के लिए, अगले जन्म में सद्गति की प्राप्ति के लिए श्राद्ध कर्म किये जातें हैं।

  विश्व में केवल हमारी ही संस्कृति में, लोक और परलोक की चिंता की जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहतें हैं की क्या सही क्या गलत इसको प्रमाणित करने के लिए तो केवल हमारे शास्त्रों में मोजूद केवल विधाता का विधान ही सक्षम है।  

     गीता शास्त्र में भगवान कृष्ण ने कहा है की पुनर्जन्म के संस्कारों के कारण ही मनुष्य का वर्तमान जन्म में भी, अधिकतर पुराने जन्म जैसा ही स्वभाव रहता है और उन संस्कारों से प्रेरित, मनुष्य अच्छा या बुरा कर्म करता है । पूर्व जन्म के अपने संस्कारों के कारण ही व्यक्ति, महात्मा और परमात्मा की तरफ आकर्षित होता है, अथवा पूर्व जन्म के कुसंस्कारों के कारण बुरी संगत की तरफ आकर्षित होता है।  

     पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण ही बहुत से मनुष्य इस जन्म में महापुरुष बने । इसी प्रकार प्रत्येक जाति और सम्प्रदाय में, पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण  अनेक महापुरुष हुए ,जिन्होंने लोक कल्याण के लिए इस जन्म में अपना सारा जीवन लगा दिया । समाज पर उनका बड़ा उपकार हुआ, यहाँ तक कि सभी लोग उन्हें सिद्ध पुरुष मानने लगे।

     कुछ महापुरुष, अद्भुत सिद्धियों से युक्त थे, उनके द्धारा कुछ लोगों का शारीरिक व आर्थिक संकट दूर हुआ, इस के कारण अधिकांश लोग, उनके इस चमत्कारिक,  दया भाव के कारण, उन्हें भगवान जैसा मानने लगे।

  • गीता ग्रन्थ में श्री कृष्ण कहतें हैं कि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है तथा मरने वाले का जन्म होना निश्चित है। गीता 2-27

  •  श्री कृष्ण कहतें हैं कि “हे परन्तप अर्जुन, मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, उन जन्मों को तू नहीं जानता है किन्तु मैं जानता हूँ”। गीता 4-5

  •  यदि भगवान में पूर्ण विश्वास रखने वाला भगवान का भक्त, अथवा भगवान् को जानने और मानने वाला कोई भगवान का प्रेमी भक्त, यदि किसी कारण से योग भ्रष्ट हो जाता है, अथार्त भगवान् से दूर हो जाता है तो, वह अगले जन्म में किसी शुद्ध आचरण वाले भगवान के भक्त के यहाँ जन्म लेता है और पुराने संस्कारों के बल पर भगवान की ओर दूनी गति से चलता है। गीता 6-41

  • पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण वह व्यक्ति, परमात्मा की प्राप्ति के लिए पहले से बढ़ कर प्रयत्न करता है।  गीता 6-43

     हिन्दू सनातन संस्कृति में अधिकतर लोगों का भगवान के प्रति अत्याधिक श्रद्धा और विश्वास होने के कारण, सभी लोग गीता में विदित भगवान श्री कृष्ण के प्रत्येक वचन पर पूर्ण आस्था रखतें हैं। श्री कृष्ण, श्रीमद्भगवद्गीता गीता में कहतें हैं कि :

  • हजारों मनुष्यों में कोई दो चार मनुष्य, मुझे प्राप्त करने के लिये यत्न करतें हैं और ऐसे मेरी प्राप्ति के लिए, उन यत्न करने वाले हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरे शरणागत होकर मुझ को तत्व से अर्थात् यथार्थ रूप से जानता है। गीता 7-3

  •  सात्विक और शास्त्रीय कर्म करने वाला मनुष्य स्वर्गलोक में निवास करने के बाद पुन्य क्षीण होने के बाद पुन: मृत्यु लोक में जन्म लेता है। गीता 9-21

  • भगवान कहतें हैं : तामसिक कर्म करने वाले और सभी से द्धेष करने वाले पापाचारी मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ। गीता 16-19

  • तामसिक गुण वाले घोर पापाचारी मनुष्य, मृत्यु के उपरांत 84 लाख योनियों में भटकतें हैं तथा पशु, कीट, सर्प, कीड़े आदि योनियाँ में जन्म लेकर, घोर नरकों को भुगतते हैं। गीता 16-20

**इस प्रकार शास्त्रों के द्धारा प्रमाणित पुनर्जन्म की बात सच साबित होती है **

Pin It

Add comment


Security code
Refresh

Related Articles