पवित्र ग्रन्थ गीता और हम लोग

पवित्र ग्रन्थ गीता और हम लोग

श्रीमद्भग्वदगीता वेदों का सार हैं। भगवान के अवतार श्री व्यास जी इस ग्रन्थ के रचेता हैं। उसमें लिखे हुए अधिकतर गूढ़ ज्ञान के विषय, हमारे जैसे सामान्य जनों की समझ से परे हैं। हमने अपने जैसे साधारण जनों के कल्याण के लिए, गुरु जनों की सहायता से बहुत ही संक्षिप्त सारांश इकठ्ठा करने का प्रयास किया हैं।

गीता ग्रन्थ को, केवल पढ़ कर हमारा भला नहीं होगा। किसी भी महात्मा की सहायता से अपने मतलब भर का केवल सारांश ग्रहण करना चाहिए। गीता 2-46

जब श्री कृष्ण, पांडवों की ओर से शांतिदूत बन कर और सुलह का सन्देश लेकर दुर्योधन के राज्य में पहुंचे तो दुर्योधन ने श्री कृष्ण भगवान को भगवान नही माना और न ही उनके किसी सुझाव को माना। दुर्योधन ने, पांडवों से बिना युद्ध किये अपने राज्य से एक गाँव भी देने को मना कर दिया। युद्ध होने से पहले अर्जुन ने युद्ध मैदान का निरिक्षण किया। वह अपने सगे सम्बन्धियों भाइयों को और गुरु जनों के सहित पितामह को देख कर मोह के कारण, विचलित हो गया।

अर्जुन ने श्री कृष्ण भगवान से कहा “हे मधुसुदन! मैं युद्ध भूमि में अपने पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य के विरुद्ध कैसे लडूंगा, में इनको मारकर  कर पाप का भागी नहीं बनना चाहता, ये दोनों तो मेरे पूजनीय हैं ” मैं ऐसा राज्य नहीं चाहता जो मुझे अपने स्वजनों को मार कर मिले।

श्री कृष्ण बोले :
    शरीर सम्बंधी मोह के कारण तू इन को अपना कहता है। इनका शरीर, और सभी मनुष्यों के शरीर नाशवान हैं, इन्हें तो एक न एक दिन नष्ट होना ही है किन्तु शरीर में बसा आत्मा अविनाशी है, अजन्मा है। शरीर के मर जाने के बाद भी यह आत्मा कभी नहीं मरता है इसलिए यह किसी को मारने का कारण भी नहीं बनता है।
•    श्री कृष्ण भगवान ने कहा: क्षत्रिय के लिए, धर्म युद्ध से बढ़ कर और कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है। यदि मोहवश तू युद्ध नहीं करेगा तो कौरव तुझे डर के मारे युद्ध से भागा हुआ मानेंगे तथा अपमान भरे वचन बोलेंगे फिर स्वभाववश, तू  युद्ध करने को विवश होगा।
•    पुन: श्री कृष्ण भगवान ने कहा, अधर्मियों का साथ देने वाले भी अधर्मी ही होतें हैं,  चाहे वह अपना पिता हो, पुत्र हो या अपना कोई सगा सम्बंधी ही क्यों न हो। धर्म की स्थापना के लिए के लिए, अधर्मियों को मारने से किसी को पाप नहीं लगता।

जब-जब संसार में अधर्म बढ़ जाता है तब-तब मैं पापियों का नाश करने तथा साधूओं का उद्धार करने के लिए संसार में अवतरित होता हूँ।
अर्जुन के मन में एक यही बात घर कर गयी कि स्वजनों से युद्ध करके और उनको मार कर, उसको पाप लगेगा। श्री कृष्ण के बार-बार यह कहने पर भी, कि “मैं तेरे सब पापों को क्षमा कर दूंगा, तुझे कोई पाप नहीं लगेगा”, उसके मन में संशय बना रहा। भगवान की बातों पर पूर्ण विश्वास न करके, अपनी बुद्धि लगाता रहा।

श्री कृष्ण ने अर्जुन को, बहुत प्रकार से भली भांति उसकी, युद्ध न करने की कायरता को दूर करने का प्रयास किया तथा उसके संशय को दूर करने के लिए  श्री कृष्ण भगवान ने, अनेक प्रकार से, कर्मयोग, ज्ञान-विज्ञान योग, भक्तियोग आदि के द्वारा समझाने का प्रयास किया, लेकिन तब भी भी अर्जुन के मन में शंका बनी रही। उसको भगवान की बातों का पूर्ण विश्वास तो हुआ पर संशय बना रहा।
    श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन से कहा कि तू मुझे मन से तो भगवान् मानता है लेकिन अपनी बुद्धि लगा कर अन्दर ही अन्दर शंका करता है।
      श्री कृष्ण ने अर्जुन को विश्वास बढाने के लिए अपनी विभुतियों का वर्णन किया। फिर भगवान् ने अर्जुन से कहा:

इस संसार में बहुत ही कम लोग हैं जो मुझ को तत्व से भगवान जानतें हैं, और आपस में प्रेम पूर्वक, भगवान् की महिमा की चर्चा करतें हैं। और उन हजारों, भगवान की चर्चा करने वालों में कोई-कोई मुझे प्रेम सहित तत्व से जानता है।
   संशय के कारण अर्जुन ने, श्री भगवान से अपना अविनाशी विश्व रूप दिखाने की प्रार्थना की। श्री कृष्ण ने अपना महाकाल का अविनाशी विश्व रूप अर्जुन को दिखाया। भगवान् के उस रूप  को देख कर अर्जुन भयभीत हो गया तब उसने भगवान श्री कृष्ण से अपना विश्व रूप समेटने की प्रार्थना की।
श्री कृष्ण कहतें हैं:   “ हे अर्जुन, क्या तेरा अज्ञान युक्त मोह नष्ट हो गया ”

      तू अपना मन का समर्पण कर और अपनी बुद्धि भी मुझको दे दे। अथार्त तू मेरा कहना मान में तुझको सारे पापों से मुक्त कर दूंगा। गीता 18-66

अर्जुन ने कहा “ हे श्री कृष्ण आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है ,अब आप की आज्ञा का पालन करूँगा, मैं युद्ध करूँगा ”   

  •  श्री कृष्ण कहतें हैं कि जो भक्त, प्रेम सहित इस विषय को दूसरों से भी कहेगा वह सदा ही मेरा प्रिय रहेगा। गीता 18-69

निष्कर्ष

   गीता पढने और समझने के बाद यह निष्कर्ष निकला की अर्जुन को जब तक पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ, तब तक वह शास्त्रीय धर्म में विश्वास करता था और उसका पालन करता था । जप, नियम, व्रत, यग्य, तीर्थाटन आदि शास्त्रीय धर्म के अंग हैं।

   जब भगवान ने अर्जुन को अपना विश्व रूप का दर्शन देकर, भगवद धर्म का ज्ञान कराया, उसके बाद ही उसका मोह भंग हुआ और तब वह भगवान के शरणागत हुआ। फिर अर्जुन ने भगवान से कहा अब आप जैसी आज्ञा देंगे वैसा ही करूँगा।

      भगवान से अनन्य प्रेम का होना और उनके शरणागत होना, भागवद धर्म के अंग हैं।

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