परमानन्द की प्राप्ति कैसे हो

परमानन्द की प्राप्ति कैसे हो

संसार का प्रत्येक व्यक्ति सुख चाहता है, आनन्द चाहता है। लेकिन किसी को यह पता न चल पाया यह आनंद किसके पास है और हमें उससे कैसे मिलेगा।

इस बात का फायदा उठाते हुए, माया बद्ध लोगों ने अपना व्यापार चलाने के लिए कई पुस्तक लिख दीं और जिनमें भगवान की कृपा से आनंद पाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन के साथ-साथ अनेक धर्म कर्म बता दिए गए। शास्त्र सम्मत न होते हुए भी ऐसी पुस्तकें लिख दी गयीं, जो धर्म के नाम पर भ्रम फैला रहीं हैं।

        रामचरित मानस के उत्तर कांड में बताया गया है की कलियुग में मनुष्य के सीमित सामर्थ, साधन और शक्ति के कारण शास्त्र विदित, योग, यज्ञ जप, तप, व्रत, आदि ठीक-ठीक नहीं किये जा सकते हैं और इन साधनों से भगवान् की कृपा नहीं मिला करती है।

 मिले न रघुपति बिन अनुरागा, किये  जोग जग्य  तप वैरागा ।।

भगवान को जानकर और मानकर भगवान से यदि प्रेम हो जाय केवल तब ही  भगवान् की कृपा होगी।

      कोई एक है, जो किसी को दिखाई नहीं देता, जिसको सभी शास्त्र परमात्मा कहतें हैं ,जिसका आदि है न अंत है। जो सबसे शक्तिशाली है जो, भूत भविष्य और वर्तमान की सभी बातों को जानता है। जिसका जन्म नहीं हुआ किन्तु साकार रूप में प्रत्येक युग में अवतरित हुआ, जिसको जानना बहुत कठिन है, जिसके बारे सभी शास्त्र कहतें है कि उसको कोई नहीं जान सकता। कुछ शास्त्र कहतें उस को जाना जा सकता है, उसको बहुत से व्यक्तियों ने जाना है और परमात्मा के गुणों से युक्त होकर महात्मा बन गए  उसको कैसे जाना जाय ताकि हमें पता चले उसका हमारा सम्बन्ध क्या है। केवल शास्त्रों और पुराणों  का अध्यन करने से, अपनी बुद्धि के बल पर भगवान के बारें में पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता है।  वेदों शास्त्रों में दो विरोधी बातें लिखी हुई हैं, जिसके कारण हम साधारण लोग बहुत भ्रमित हो जातें हैं।

  वह अविनाशी परमात्मा है , वह सर्वव्यापक है और आत्मा (प्राण) के रूप में हमारे अन्दर है, उसके अंश होने के कारण हमारी आत्मा भी अविनाशी है। अंशी के अधिकतर गुण उसके अंश में होतें हैं, जैसे समुद्र की एक बूंद में समुद्र के सभी गुण होतें हैं उसी प्रकार सृष्टि, उत्पत्ति-संहार और कर्मों का  फल देने को छोड़ कर हम सभी जीवों में परमात्मा के सभी गुण, मोजूद हैं। लेकिन हमें अपने अन्दर इन गुणों की अनुभूति नहीं हुई। इसका कारण है कि अनेक जन्मों से अज्ञान का पर्दा हम पर पड़ा हुआ है। पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के पर ही हम लोग अपने अन्दर बैठे हुए परमात्मा को जान सकतें हें   -बालकाण्ड –रामचरित मानस

     क्या आज तक कोई व्यक्ति किसी विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए स्वयं पुस्तक पढ़ कर जानकारी प्राप्त कर सका है। किसी भी विषय में विस्तृत जानकारी और शंकाओं के समाधान के लिए उसे अवश्य ही किसी पारंगत गुरु और उस विषय से सम्बंधित पुस्तक (ग्रन्थ) की आवश्यकता रही होगी।

  • क्या कर्म है क्या धर्म है क्या उचित है, और क्या अनुचित नहीं है , उसको शास्त्र ही प्रमाणित करतें है।  गीता 16-24

    कुछ वास्तविक संतों को छोड़ कर, आजकल, धार्मिक प्रतीत होने वाले बहुत से व्यक्ति, धर्म और ज्ञान के नाम पर अपनी-अपनी दूकान चलाने का में लगे हुएँ हैं।

भगवान के नाम पर की गयी हेरा-फेरी और दूसरों को अपने स्वार्थ के लिए धोखा देने को, नामा अपराध कहतें हें  जिसका कोई प्रायश्चित नहीं होता है।

    ऐसे व्यक्तियों को उनके इस अपराध के कारण न तो कोई महापुरुष इन्हें बचा सकता हे और न ही ऐसे लोगों का भगवान बचा सकता है ।

प्रत्येक शास्त्र में दो विरोधी बातें होतीं हैं जिनको पढ़ कर साधारण जन भ्रमित हो जातें हैं। लेकिन दोनों ही बातें अपनी जगह ठीक होतीं हैं। लेकिन कोई महापुरुष अथवा सद्गुरु ही हमारी शंकाओं का समाधान कर सकता है।

       रामचरित मानस में भगवान की प्राप्ति के लिए राम नाम के जाप करने की बड़ी महिमा बताई गयी है लेकिन उसी राम चरित मानस के उत्तरकाण्ड में इस बात को काट दिया गया है।

       एही  कली  काल न  साधन दूजा ,  योग यज्ञ जप तप पूजा।

         कहहु भक्ति पथ कवन प्रयासाजोग न मख जप तप उपवासा।।

   योग-यग्य-जप-तप-पूजापाठ-उपवास, आदि ये सभी साधन  भगवान् की प्राप्ति के लिए सहायक नहीं हैं।

       यदि श्री कृष्ण की अनन्य भाव से भक्ति की जाय तो गीता के अनुसार, भगवान बिना किसी अन्य माध्यम के आपको, आपकी आत्मामें स्वयं तत्व ज्ञान दे देंगे।

           हि ज्ञानेन सदृशं  पवित्रमिह  विद्यते।

         तत्स्वयं योगसंसिद्ध:कालेनात्मनि विन्दति।।  गीता४-३८

      भावार्थ:  जो मनुष्य, भगवान् के बताए हुए कर्म योग की विधि के अनुसार सारे कर्म अनासक्त भाव से करता है और सारे कर्मो का फल भगवान् को अर्पण कर देता है, जिसका अंतःकरण, गुरु के सानिध्य में रह कर साधना एवं सत्संग करने से शुद्ध हो चुका है,जिसकी सारी कामनाएँ समाप्त हो गयीं हैं, जिसको अनन्य भाव से भगवान् से प्रेम हो गया है ऐसा भगवान् के शरणागत हुआ मनुष्य, भगवान की कृपा से उस तत्व ज्ञान को अपने-आप ही अपनी आत्मा में पा लेता हें। वह सम्पूर्ण पापों और संतापों से मुक्त हो जाता है। फिर उसको कुछ पाना शेष नहीं रहता है।

  वेद-शास्त्र और पुराणों का अध्यन इसलिए आवश्यक है यदि प्रवचन देने वाले व्यक्ति की बातों पर हमें कोई शंका हो जाय अथवा हम उसकी बातों को ध्यानपूर्वक न सुन पाये तो प्रमाण के लिए शास्त्रों का सहारा लेकर इस उलझन को  दूर किया जा सकता है।

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