पाप कर्म और प्रायश्चित क्या होता है

पाप कर्म और प्रायश्चित क्या होता है

केवल अनजाने में अज्ञानता वश किये गए पाप कर्म का प्रायश्चित करने का विधान है। यदि हम प्रायश्चित करने के बाद फिर पाप करेंगे तो उसके दुःख भरे फल का निदान नहीं होगा।

शुभ फल नहीं मिलेगा और दुःख ही दुःख मिलेगा। पाप कर्म के लिए प्रायश्चित करने का लाभ तो जब है, जब हमारा मन भी, उस प्रायश्चित कर्म से शुद्ध बन जाय, निर्मल मन बन जाय और हम भविष्य में सावधानी पूर्वक कर्म करें।

          संसार में सभी कर्मों-धर्मों का एक ही लक्ष्य है सुख की प्राप्ति। सुख दो प्रकार का होता है – शरीर सम्बंधी सुख – और आत्मा का सुख। इन दोनों में संतुलन बनाकर चलना ही हमारे लक्ष्य को प्राप्त करा सकता है। सुख के साथ शांति और संतोष बना रहे, वास्तव में यही आत्मा का सुख है। यदि हमारा मन अशांत है तो ऐसे समय में अधर्म का कार्य होने की पूरी संभावना रहती है।

        किसी भी कर्म को करने के लिए ,चाहे वह संसार से संबधित हो अथवा भगवद् विषय से संबधित हो, शरीर का स्वस्थ रहना आवश्यक है। स्वस्थ शरीर से ही संसारिक कार्य ठीक-ठीक हो सकता है और भगवद् विषय सम्बंधी कार्य भी विधि पूर्वक किया जा सकता है। स्वस्थ शरीर के साथ धन वैभव होने पर हम लोग भगवद् सम्बंधी विषय में लापरवाह हो जाते हैं इस कारण, हमारे पास सब सब कुछ होते हुए भी अशांत रहतें हैं। अशांत व्यक्ति भ्रमित रहता है और वह सुख के साथ शांति पाने के लिए कुछ न कुछ प्रयत्न करता है लेकिन अपने सुख के समय के मतलबी साथियों की संगत में रह कर ऐसा कार्य कर बैठता है जिस के कारण उसे पछतावा होता है।

    अधिकतर सभी साधारण अज्ञानी व्यक्ति अपने स्वार्थ, अपनी शक्ति और अपने धन के बल पर पाप कर्म करतें हैं। इस तरह के धर्म विरोधी कर्मों के लिए संसार में दंड का विधान है और परमात्मा के विधान के अनुसार भी दंड भोगना पड़ता है। हमारे शास्त्रों में इन पाप कर्मों के अनिष्ट फल से बचने के लिए हमारे लिए प्रायश्चित करने की विधि दी हुई है।

    मनुष्य का शरीर ज्ञान प्रधान है। मनुष्य के अलावा और किसी भी योनी का शरीर ज्ञान प्रधान नहीं है। मनुष्य शरीर ज्ञान प्रधान होने के कारण बड़े से बड़ा पुण्य कर सकता हे इसी प्रकार अपने ज्ञान के कारण मनुष्य बड़ी चालाकी से बड़े से बड़ा पाप कर सकता है। यदि इस शरीर को अच्छे काम में न लगाया गया तो वह बड़ी तेजी से ख़राब काम में लगेगा। हमारी हिन्दू संस्कृति के अंतर्गत, हमारे सभी शास्त्र समस्यों और शंकाओं के समाधान करने के लिए हैं न कि समस्याओं को जटिल करने के लिए। पाप कर्म का प्रायश्चित करने की विधि हमारे शास्त्रों में विदित है।

      यदि हमसे जाने अनजाने में कोई धर्म विरुद्ध कर्म हो गया है और किसी ज्ञानी-बुद्धिमान व्यक्ति ने हमें, उस धर्म विरुद्ध कर्म का बोध करा दिया है तो, हमें अपने भले के लिए, शास्त्र विधि से प्रायश्चित करने के विधान के बारे में किसी ब्राह्मण अथवा शास्त्रों के जानकार व्यक्ति से प्रायश्चित करने की विधि पूछना चाहिए और भविष्य में हमें सावधानी पूर्वक व्यवहार करना चाहिए।  

   प्रत्येक पाप कर्म के लिए प्रायश्चित का विधान नहीं होता है जैसे नामा अपराध अथार्त परमात्मा और महात्मा के प्रति किये गए अपराध का कोई प्रायश्चित विधान नहीं है। उस कर्म के अनिष्ट फल को दूर करने के लिए उस महात्मा की ही शरण में ही जाना पड़ता है, जिसके प्रति अपराध हुआ है। जैसे महामुनि दुर्वासा को, भगवान के कहने पर राजा अम्बरीश की शरण में जाना पड़ा था।

  किसी धर्म विरोधी कर्म के लिए, प्रायश्चित करने से भविष्य में दंड से तो बचा जा सकता है लेकिन प्रायश्चित करने से मन निर्मल नहीं हो पाता है। जिस प्रकार किसी अपराधी को, उसके अपने द्वारा अपराधिक कर्म करने से उसको कुछ निश्चित अवधि के लिये जेल हो जाती है और सजा की अवधि पूरी होने के बाद उसे छोड़ दिया जाता है। लेकिन उस अपराधी का सजा पाकर मन निर्मल नहीं होता है इसलिए भविष्य में वह फिर अपराध करता है। कोई भी शास्त्रीय कर्म के द्वारा प्रायश्चित करने का विधान, व्यक्ति के मन को निर्मल नहीं बना सकता।

  पूर्व जन्मों में संचित पाप कर्मों के लिए कोई प्रायश्चित नहीं होता है। इस जन्म में किये गए पापों के फल से बचने के लिए, कोई कोई प्रायश्चित करने का शास्त्रीय विधान इतना विस्तृत और कठिन है की जन साधारण के लिए उसके पालन का तो सवाल बहुत दूर है उस विधान को, इस कलियुग में समझना ही कठिन है। देश, नियम, विधि, आचार्य, जप और हवन के लिए उचित पात्र और दान के लिए सैकड़ों तरह की वस्तुएं, पर्याप्त  मात्रा में स्वर्ण जैसी दुर्लभ वस्तुओं का मिल पाना अत्यंत कठिन है।

   अज्ञानतावश जब व्यक्ति अपने सिमित ज्ञान के अहंकार के कारण ,महात्मा और परमात्मा को चुनौती देता है की उसने कभी पाप नहीं किया है तो उसे क्यों दुःख मिल रहा है लेकिन वह भूल जाता है कि उसने अपने अनंत जन्मों में अनंत पाप किये  हुए है और उसके अनेक जन्म के संचित पापों के कारण, उसे बार-बार दुःख उठाना पड़ता है। अपने अज्ञात पाप कर्मों के कारण दुःख तो सभी को मिलता है लेकिन भगवान की शरण में जाने से जो ज्ञान मिलता है ,उससे दुःख सहने की शक्ति मिलती है और वह व्यक्ति भविष्य में सावधानी पूर्वक कर्म करता है।

     इसीलिए भगवान से कुछ न मांग कर, उत्तम बुद्धि को प्रदान करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

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