मनुष्य की अधोमुखी प्रवृत्ति और उससे बचने के उपाय - भाग 1

मनुष्य की अधोमुखी प्रवृत्ति और उससे बचने के उपाय - भाग 1

जैसे सारे शरीर के सभी अंगों में एक ही आत्मा व्याप्त है, किसी भी अंग पर आघात होता है तो हम उसे अपने ऊपर आघात का अनुभव करते हैं और स्वाभाविक ही सभी अंग एक-दुसरे अंग की रक्षा तथा कल्याण साधना में लगे रहते हैं वैसे ही समस्त समष्टि जगत में भी एक ही आत्मा व्याप्त है, इस सत्य का अनुभव हो जाने पर ही मानव की मानवता पूर्णता को प्राप्त होती है।

 यही मानव जीवन की सफलता है। ऐसा हो जाने पर फिर कोई भी मानव किसी भी प्राणी का बुरा नहीं चाहेगा, कभी किसी का अकल्याण नहीं करना चाहेगा, सबकी रक्षा करेगा और सबके कल्याण-साधन में लगा रहेगा। भूल या प्रमादवश कभी कुछ अनिष्ट कार्य हो जायेगा तो उसे वैसे ही दुःख होगा, जैसे भूल से अपने ही द्वारा अपने किसी अंग पर चोट लग जाने से हमें होता है। यह दूसरी बात कि कभी किसी अंग में अन्दर सडन पैदा होने पर जैसे हम उसका आपरेशन कराते हैं और अंग को कटवाकर सरे शरीर को विष के प्रभाव से बचा लेते हैं, ऐसे ही शुद्ध नीयत तथा कल्याण की भावना से कभी समष्टि जगत में भी ऐसा कार्य करना पड़ता है, जो देखने में कठोर होता है, पर वास्तव में वहाँ उद्देश्य विशुद्ध कल्याण साधन ही होता है।

मनुष्य को अपने जीवन में इसी लक्ष्य को सामने रख कर चलना चाहिए। यह निश्चय रखना चाहिए कि जिस कार्य के करने से परिणाम में दूसरों का अहित या अकल्याण होगा, उससे हमारा हित और कल्याण कभी नहीं होगा एवं जिसके परिणाम में दूसरों का हित या कल्याण होगा, उससे हमारा अहित या अकल्याण कभी नहीं होगा। यही धर्म का स्वरुप है। यही पाप और पुण्य की परिभाषा है। दूसरों का अकल्याण ही पाप है और दूसरों का कल्याण ही पुण्य है; क्योंकि वास्तव में समष्टि दृष्टि से हम सब एक ही हैं। शरीर के किसी एक अंग के अहित से हमारा ही अहित होता है और हित से हमारा ही हित होता है, यही सत्य सिद्धांत है।

मनुष्य का "स्व" जब समष्टि से निकलकर केवल व्यष्टि में आ जाता है, तब उसका स्वार्थ (स्व-अर्थ) भी अपने व्यक्तित्व की सीमा में ही संकुचित हो जाता है, फिर वह केवल अपने लिए ही सुख चाहता है, उसी के लिए सचेष्ट होता है, उसी के प्रयत्न में लगा रहता है और जितना ही वह इस कुमार्ग में आगे बढ़ता है, उतनी ही उसकी विषयासक्ति तथा तज्जनित भोग-कामना बढ़ती रहती है और कामना जहाँ सफल होती है वहाँ लोभ जाग उठता है। क्रोध और लोभ-दोनों ही मनुष्य की बुद्धि का नाश कर देते हैं, फिर उसकी बुद्धि में जो कुछ निश्चय होता है, सब जगत के हित के विपरीत होता है और फलतः उससे उसका अपना अहित-विनाश तो निश्चित ही है-"बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।"

 इसी बुद्धिनाश की स्थिति में मनुष्य अनुचित तथा अकल्याणकारी साधनों द्वारा सुख सामग्री संग्रह करना चाहता है-हिंसा, अधर्म-युद्ध, डकैती, चोरी, छल, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, अनाचार, प्रतिहिंसा, द्रोह, वैर, मद आदि दुर्गुण-दुराचार उसके जीवन के स्वभाव या स्वरुप बन जाते हैं। वह मनुष्य रूप में ही हिंसक पशु, असुर, पिशाच, राक्षस बन जाता है और अपने कुकृत्यों द्वारा अपने भविष्य को घोर पतन, दीर्घकालीन संकट, यातना, पीड़ा और विविध भयानक ताप-संतापों का क्रीडा-क्षेत्र बना लेता है।

आज का मानव दुर्भाग्यवश इसी पतन की ओर अग्रसर है। वह विश्व प्राणी की सेवा, संयम, नियम, धैर्य, मन-इन्द्रिय के निग्रह, अपरिग्रह, त्याग, प्रेम, उदारता, मर्यादा, शील, परदुःखकातरता, पर-हित-साधन, शांति, भगवदविश्वास, विनय, विचारशीलता, शास्त्र-मर्यादा, परलोक की गति का विचार आदि को भूल कर अत्यंत संकुचित स्वार्थग्रस्त, असंयमी, उच्छ्रंखल, अधीर, मन-इन्द्रियों का गुलाम, संग्रह-परायण, भोग-जीवन, घृणापरायण, निज सुखाकांक्षी, कृपण, मर्यादा-शून्य, शीलरहित, पर-सुख-कातर, पर-अहितपरायण, नित्य घोर अशान्त, उत्तेजित, आवेशमय, भगवदविश्वासरहित, अभिमानी, अविवेकी, शास्त्रमर्यादानाशक, और केवल, इहलोक की मान्यता वाला होकर जीवनकाल में भीषण चिंताओं की अग्नि से जलता हुआ-असफल जीवन होता हुआ ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मृत्यु के बाद तो दुर्गति-घोर नरकों की प्राप्ति होती ही है। मानव जीवन का इस प्रकार का अंत अत्यंत ही शोचनीय है।

आज समष्टि और व्यष्टि-जगत में जो कुछ हो रहा है, जो कुछ किया-करवाया जा रहा है, वह इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। उदाहरणार्थ-विज्ञान विश्व-प्राणियों के ध्वंस की सामग्री के अविष्कार में लगा है, एक देश दूसरे देश को हड़प जाना चाहता है, एक वाद दूसरे वाद को मिटा देना चाहता है, एक ही वाद या मत के लोग परस्पर एक-दूसरे के पतन और विनाश के प्रयत्न में लगे हैं, धर्म के नाम पर अन्य धर्म को छल-बल कौशल से मिटाने की चेष्टा हो रही है, भगवान तथा धर्म का तिरिस्कार करके स्वेच्छानुसार आचरण तथा उच्छ्रंखल व्यवहार किया जा रहा है। शिक्षा में से निति-धर्म, सदाचार का बहिष्कार करके बालकों, युवकों, बालिकाओं और युवतिओं को सदाचार विरोधी, चरित्रहीन, धर्मविमुख और यथेच्छाचारी बनाया जा रहा है। मर्यादित और संयमी जीवन के स्थान पर फैशन, शौकीनी, बाहरी बनावट, चरित्रभ्रष्टता, अनियंत्रितता, उच्छ्रंखलता आदि को जीवन का स्वरुप बनाया जा रहा है, सो भी उच्च जीवन स्तर के नाम पर मनुष्य के भोग तथा अर्थ लाभ के लिए विश्व के इतर प्राणियों की भांति-भांति से निर्दय हिंसा के आयोजन हो रहे हैं- बड़े-बड़े कसाईखाने इसके प्रमाण हैं। खान-पान में सात्विकता तथा विशुद्धि के स्थान पर तामस वस्तुओं का, मद्य-मांस-अण्डों का, अपवित्र अखाद्य पदार्थों का प्रसार-प्रचार बढ़ाया जा रहा है, धनलोलुपता तो मनुष्य में यहाँ तक बढ़ी है और उसने मनुष्य को इतना गिरा दिया है कि वह छल, कपट, चोरी की बात तो अलग रही, खान-पान की वस्तुओं में और दवाईयों में भी मनुष्य के लिए प्राणघातक वस्तुओं का मिश्रण करने में अपने को द्रव्यउपार्जन में चतुर और बुद्धिमान मानकर गौरव का अनुभव करता है। पवित्र विवाह-संस्था उठने लगी है और उसके स्थान पर पशुओं से भी निकृष्ट अमर्यादित पशुता का हमारे युवक-युवतिओं में उदय होने लगा है। गुरु-शिष्य का पवित्र तथा आदर्श सम्बन्ध छिन्न-भिन्न हो रहा है। गुरुओं में स्नेह नहीं है और शिष्य इतने अनुशासनहीन तथा यथेच्छाचारी हो गये हैं कि गुरुओं पर घातक आक्रमण करते हैं। पैसों के प्रलोभन, रिश्वत, दबाव, भय, छल, मिथ्या आश्वासन आदि के द्वारा जनतंत्रों का जीवन भयानक और घृणास्पद बनाया जा रहा है और इस प्रकार मानव आज अपने अविवेक के कारण मस्तिष्क का संतुलन खोकर मानवता के  पतन के अनन्त विविध अविष्कार, विचार, योजना तथा कार्यों को नित्य नये-नये रूपों में अपनाने लगा है आत्यंतिक अज्ञान की महामोहमयी मदिरा पीकर! इसके पता लगता है कि मनुष्य किधर जा रहा है।

घोर दुःख की बात तो यह है कि अध्यात्मप्रधान भारत में- जहाँ से अतीतकाल से सारे विश्व को उसके उज्जवल चरित्र के द्वारा जहाँ प्रकाश मिलता था, आज स्वयं महान्धकार के गर्त में गिरता चला जा रहा है। प्रकाश तिरोहित हो रहा है। यों ही होता रहा तो पता नहीं क्या होगा, पतन किस सीमा तक जायेगा। भारत के आस्तिक जनों को इस घोर पतनोन्मुख परिस्थिति में बड़े विश्वास के साथ ईश्वर की आराधना करनी चाहिए-सभी स्थानों में सभी प्रकार से उसे जीवन का प्रथम तथा परम कर्तव्य मानकर। भगवत्कृपा से ही इस भयानक अंधकार का नाश हो सकता है।

वस्तुतः तमसाच्छ्न्न बुद्धि या बुद्धि-भ्रष्टता के कारण विश्व मानव इसी कुपथ पर आगे बढ़ता रहा तो इसका परिणाम बहुत ही भयानक हो सकता है। संभव है, इसके परिणाम स्वरुप विश्व में विनाशकारी अस्त्रों के युद्ध हो जाएँ अथवा कोई भीषण महामारी हो जाये, जिससे प्रजावर्ग का महान संहार हो जाए।पाप का परिणाम विनाश, दुःख, पीड़ा, नरकयंत्रणा आदि होते हैं। प्रकृति किसी के साथ पक्षपात नहीं करती, भगवान के मंगल-नियमों से आबद्ध वह अपनी निति का पालन करेगी ही। यह भगवान की लीला है। इस विनाश-लीला में साधू-चरित्रों, सात्विक मानवों के भी भौतिक पदार्थों तथा भौतिक देहों का भी प्रारब्धवश भगवान के नियमानुसार वियोग होगा ही, पर वे दुःख, पीड़ा, नरक-यंत्रणा के भागी नहीं होंगे। परिवर्तनशील प्रकृति के प्रत्येक परिवर्तन में ईश्वरविश्वासी संत भगवान की लीला का चमत्कार देखते हुए नित्य प्रसन्न और लीला-वैच्त्रिय दर्शन से प्रमुदित होते रहते हैं, भले ही वह लीला सुन्दर मधुर-रस की हो या भयानक वीभत्स-रस की। प्रत्येक लीला में वे लीलामय के दर्शन करते हुए मुग्ध और आनंदमग्न रहते हैं।

आत्मा की एकता तथा अमरता, उसके सच्चिदानंदस्वरुप तथा विश्व के रूप में भगवान ही प्रकट होकर सृजन-संहार की अनवरत लीला करते हैं-ऐसा विश्वास रखने तथा अनुभव करने वाले लोगों पर इन परिवर्तनों में कोई दुःखमय प्रभाव नहीं पड़ सकता। वे सदा ही नित्य सत्य सनातन भगवान के मंगलमय विधान में मंगलमयता ही देखते हैं। वे देखते हैं विश्व में दो ही चीज-एक लीलामय भगवान, दूसरी भगवान की लीला एवं लीला के रूप में लीलामय ही प्रकट रहते हैं, अतएव एक भगवान ही भगवान।

शेष अगले अंक में...                          

Pin It

Add comment


Security code
Refresh

Related Articles