चिंता चिता समान-चिंता नहीं, चिंतन करें

चिंता चिता समान-चिंता नहीं, चिंतन करें

चिंता हम सभी के जीवन में किसी न किसी रूप में आ जाती है। चिंता होना स्वाभाविक भी होता है, लेकिन ऐसी बहुत-सी व्यर्थ चिंताएँ हमारे पास होती हैं, जो हमारे जीवन को घुन की तरह खाती रहती  हैं और इस कारण मनुष्य कभी किसी लक्ष्य तक पहुँच नहीं पाता और अपना जीवन व्यर्थ की चिंताओं में गँवा देता है। चिंता हमारे भविष्य के दुखों को कम नहीं करती है, बल्कि वर्तमान की, आज की खुशियों से हमें दूर कर देती हैं।

आज के दौर में देखा जाए तो बेवजह चिंता करना मनुष्य का स्वभाव बनता जा रहा है। आज चिंताओं से मुक्त रहने के लिए लोग पहले से अधिक दवाएँ खा रहे हैं, जो कि बिलकुल भी ठीक नहीं है। आंकड़ों के अनुसार, 40 प्रतिशत व्यक्ति उन स्थितियों की चिंता करते हुए परेशान हैं, जो शायद कभी घटेंगी ही नहीं। 30 प्रतिशत व्यक्तियों की चिंताएँ उन घटनाक्रमों को लेकर होती हैं, जो घट तो चुके हैं और उनके पुनः घटने की आशंका है। 12 प्रतिशत व्यक्तियों की चिंताएँ सेहत संबंधी होती हैं। 10 प्रतिशत व्यक्तियों की चिंताएँ रोजमर्रा के कामों से जुडी होती हैं। 8 प्रतिशत व्यक्तियों की चिंताएँ उन कारणों को लेकर होती हैं जिन पर चिंता करना आवश्यक है और समय पर निर्णय लेने से सार्थक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

इस तरह हम देख सकते हैं कि 92 प्रतिशत व्यक्तियों की चिंताएँ उन कारणों को लेकर हैं, जिन्हें बदल पाना हमारे हाथ में नहीं है। ये चिंताएँ उन घिर गए बादलों की तरह हैं, जो जीवन में आने वाले नए विचारों की रोशनी को रोकती हैं और हमें वर्तमान की खुशियों से भी दूर कर देती है। इसीलिए इन चिंताओं में अपनी उर्जा को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए और कुछ करना ही है तो इन चिंताओं के पीछे छिपे अवसरों को ढूँढना चाहिए।

हम सभी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जीवन एक त्यौहार की तरह है, जिसमे सबको कुछ न कुछ अवश्य मिलता है, पर यह जरूरी नहीं कि जो हम चाहते हैं वही हमें मिले। लेकिन अपनी इस चाहत में हम चिंता करने लगते हैं। मिलता है तो बहुत खुश होते हैं और नहीं मिलता तो पुनः उसे पाने के लिए चिंता करते हैं। असफल होने पर दुःखी होते हैं, निराश हो जाते हैं, लेकिन चिंता करने की आदत नहीं छोड़ते।

इस तरह चिंता करने वाले जीवन में हासिल तो कुछ नहीं कर पाते, परंतु अपने हाथ में आए हुए अवसरों को गवां जरूर देते हैं। शास्त्रों में एक कथा आती है कि एक व्यक्ति को अपनी एक आँख से दिखाई देना बंद हो गया। उसे बड़ा दुःख हुआ, परन्तु उस दुःख से अधिक चिंता इस बात की हुई कि अब आगे उसे क्या-क्या कष्ट उठाने होंगे। इस परेशानी में उसे दो दिन ठीक से नींद नहीं आई और इस तरह जागने से उसकी दूसरी आँख में भी पीड़ा होने लगी। उसे यह चिंता होने लगी कि कहीं उसकी दूसरी आँख भी न चली जाए। चिकित्सक ने उसे समझाया कि तुम चिंता छोड़ दो और विश्राम करो। तुम्हारी दूसरी आँख बिलकुल ठीक है, एक-दो दिन में जो पीड़ा है, वह भी जाती रहेगी तो उस व्यक्ति ने चिकित्सक के परामर्श के अनुरूप कार्य किया और स्वस्थ हो गया। इस तरह से कष्ट स्वयं में इतना दुःखदायी नहीं होता, जितनी उसके बारे में की जा रही व्यर्थ की चिंता होती है।

कई बार हमारे जीवन में आ रही विपरीतताएँ चिंता करने का कारण बन जाती हैं और हम बजाये उनका सामना करने के, परेशान रहने लगते हैं; जबकि सचाई यह है कि ये विपरीतताएँ ही हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं और सही प्रयास करने पर हमारी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। पहाड़ी ढलानों पर दौड़ कर प्रशिक्षण हासिल करने वाले खिलाड़ी कभी ओलंपिक नहीं जीतते। जीतते वही हैं, हो पहाड़ों पर चढ़ाई की तरफ दौड़ने का अभ्यास करते हैं; क्योंकि जिजीविषा में बढ़ोतरी उसी से होती है। इस तरह कठिन संघर्षों से, मेहनत-पुरुषार्थ से जीवन के नए आयामों को देखा जा सकता है और चिंता रुपी अंधियारे को जीवन से दूर किया जा सकता है।

युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि “चिंतन कीजिये, चिंता मत कीजिये।” चिंतन और चिंता में जमीन आसमान का अंतर है। चिंतन है-बात के हर पहलु पर विचार करना और चिंता है-अनहोनी बात से अपने मन में भय को प्रश्रय देना। चिंतन आवश्यक है; जबकि चिंता एकदम निरर्थक है। जितनी उर्जा मनुष्य व्यर्थ की चिंताएँ करने में नष्ट करता है यदि वह उतनी उर्जा, अच्छा चिंतन करके समस्या का समाधान ढूँढने में लगाए तो उसको सफलता प्राप्त करने से कौन रोक सकता है?

इसीलिए समाधान यही है कि ऐसे विषयों की चिंता न की जाए, जिनका कोई समाधान नहीं, जिनके लिए कुछ नहीं किया जा सकता। चिंतारहित जीवन का सबसे सीधा और लाभप्रद मार्ग है-चिंता छोड़कर चिंतनपूर्वक काम किया जाये। जो बीत गया, वह वापस नहीं आएगा और जो आने वाला है, उसकी चिंता करने से उसमें कोई फेर बदल नहीं किया जा सकता, अगर कुछ किया जा सकता तो वर्तमान में काम किया जा सकता है, इसमें हमारा भविष्य बदल सकता है। इसलिए चिंता करने के बजाये कार्य करने की योजनाएँ बनानी चाहिए और सही ढंग से चिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।    

 

  

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